CHAPTER- 12 पृथ्वी से परे
Notes
1. प्राचीन काल में साफ आकाश के कुछ विशिष्ट तारे नुब्रा से हो कर जाने वाले कारवां के लिए दिशा सूचक का काम करते थे।
2. तारे स्वयं के प्रकाश से चमकते हैं।
3. तारों और उनके पैटर्न की पहचान प्राचीन काल में यात्रियों के लिए एक उपयोगी कौशल था।
4. पूर्वकाल में तारा समूहों के पैटर्न को तारा-मंडल कहा जाता था।
- बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (इंटरनेशनल एस्ट्रोनाॅमिकल यूनियन- आई. ए. यू.)। ने अंतरराष्ट्रीय सहमति से तारा-मंडल की परिसीमाओं को परिभाषित किया।
- आधिकारिक रूप से 88 तारा-मंडल सूचीबद्ध किए गए हैं।
- तारा-मंडल ओरायन को प्रायः शिकारी के रूप में निरूपित किया जाता है। इस तारा-मंडल के बीचों-बीच जो तीन तारे हैं वे शिकारी की पेटी (बेल्ट) कहलाते हैं।
- कैनिस मेजर तारा-मंडल का तारा लुब्धक (सिरियस) रात्रि-आकाश का सबसे चमकीला तारा हैं।
5. ध्रुव तारा- ध्रुव तारा उत्तर दिशा में अचल दिखाई पड़ता है, जिसकी सहायता से उत्तरी गोलार्ध में उत्तर दिशा की पहचान की जा सकती हैं।
6. सूर्य- यह एक तारा हैं, यह गैसों का एक अत्यंत गर्म गोला है।
- सूर्य ऊष्मा एवं प्रकाश उत्पन्न करता है जो पृथ्वी पर ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं।
- व्यास में यह पृथ्वी से लगभग 100 गुना बड़ा है।
- पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है।
7. परिक्रमण- किसी पिंड का सूर्य के चारों ओर घूमना परिक्रमण कहलाता है।
8. ग्रह- ग्रह एक विशाल और लगभग गोलाकार पिंड होता है, जो सूर्य की परिक्रमा करता है।
- पृथ्वी भी एक ग्रह है, सूर्य की परिक्रमा पूरी करने में पृथ्वी को लगभग एक वर्ष का समय लगता है।
- सूर्य से बढ़ती दूरी के क्रम में सौर परिवार के आठ ग्रह है- बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं वरुण।
- सूर्य के सबसे निकट के चार आंतरिक ग्रह है- बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल। ये चारों आकार में छोटे हैं। इनकी सतह ठोस और चट्टानी है।
- पृथ्वी की सतह का एक बड़ा भाग पानी से ढका है इसीलिए अंतरिक्ष से यह नीले रंग की दिखाई देती है। इस कारण पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहा जाता है।
- मंगल को लाल-ग्रह कहा जाता है। इसका कारण है मंगल ग्रह की मृदा का रंग लाल होना।
- सबसे बाहर के चार ग्रह है- बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं वरुण।
9. दूरदर्शक यंत्र- ये अनेक धुंधले पिंडों को देखने में हमारी सहायता करता है, जो बिना किसी उपकरण के केवल आंखों द्वारा दिखाई नही देते हैं।
10. प्राकृतिक उपग्रह- ग्रहों की परिक्रमा करने वाले पिंडों को सामान्यतः उपग्रह कहा जाता है। वे आकार में ग्रहों की तुलना में छोटे होते हैं।
- ग्रहों के प्राकृतिक उपग्रहों को चंद्रमा कहा जाता है।
- पृथ्वी का एक चंद्रमा है जबकि मंगल के दो चंद्रमा है। बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं वरुण ग्रहों के कई चंद्रमा है।
11. चंद्रमा- पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 27 दिन का समय लेता है।
- चंद्रमा का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग एक चौथाई है।
- चंद्रमा की सतह पर वृत्ताकार कटोरेनुमा संरचनाएं दिखाई पड़ती है, जिन्हें गर्त (क्रेटर) कहते हैं।
- भारत ने चंद्रमा के अध्ययन के लिए 3 चंद्रयान अभियान पूरे कर लिए हैं और चौथे की तैयारी चल रही हैं।
- चंद्रमा पर भारत का पहला अभियान चंद्रयान-1 सन् 2008 में छोड़ा गया था।
- दूसरा मिशन चंद्रयान-2 सन् 2019 में भेजा गया।
- तीसरे मिशन के अंतर्गत चंद्रयान-3 को जुलाई 2023 में प्रक्षेपित किया गया।
- अनेक क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच अपने-अपने पथों पर सूर्य की परिक्रमा करते हैं, यह क्षेत्र क्षुद्रग्रह पट्टी कहलाता है।
13. धूमकेतु- कभी-कभी सौर परिवार के बाहरी क्षेत्रों से कुछ आगंतुक पिंड हमारे सौर परिवार में आते हैं। लंबी पूंछ वाले इन पिंडों को धूमकेतु कहते हैं।
- ये धूल, गैसों, पत्थर के टुकड़ों और बर्फ के बने होते हैं।
14. सौर परिवार- सूर्य, आठ ग्रह, उनके उपग्रह और अनेक अपेक्षाकृत छोटे पिंड, जिनमें क्षुद्रग्रह, धूमकेतु शामिल है, ये सब मिलकर सौर परिवार कहलाते हैं।
15. मंदाकिनी आकाश गंगा- एक मंदाकिनी में करोड़ों से लेकर अरबों तक तारें होते हैं। हमारा सौर परिवार मंदाकिनी आकाश गंगा का ही भाग है।
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प्रश्न- 1. निम्नलिखित का मिलान कीजिए-
उत्तर- प्रश्न- 2. (क) निम्नलिखित पहेलियों को हल कीजिए-
मेरे नाम का पहला अक्षर मंत्रणा में है यंत्रणा में नहीं,
मेरे नाम का दूसरा अक्षर गगन और सागर दोनों में है,
मेरे नाम का तीसरा अक्षर जल में है, जग में नहीं,
मै सूर्य की परिक्रमा करने वाला एक ग्रह हूं।
(ख) इस प्रकार की दो पहेलियां आप स्वयं बनाइए।
उत्तर- (क) मंगल
(ख) इस प्रकार की दो पहेलियां:
1) मेरे नाम का पहला अक्षर शुक्रिया है पर मैं दुनिया नहीं, मेरे नाम का दूसरा अक्षर काम है पर आम में नहीं, मै न तो सूरज के ज्यादा पास न ही बहुत दूर का ग्रह हूं।
उत्तर है- शुक्र।
2) मेरे नाम का पहला अक्षर वायु है पर मैं आयु नहीं, मेरे नाम का दूसरा अक्षर रुकना है पर मैं ठुकना नहीं, मेरे नाम का तीसरा अक्षर शरण है पर मैं मरण नहीं, मैं सूर्य से बहुत दूर हूं।
उत्तर है- वरुण।
प्रश्न- 3. निम्नलिखित में से कौन सौर परिवार का सदस्य नहीं है?
(क) लुब्धक (ख) क्षुद्रग्रह (ग) धूमकेतु (घ) प्लूटो
उत्तर- (क) लुब्धक
प्रश्न- 4. निम्नलिखित में से कौन सूर्य का ग्रह नहीं है?
(क) बृहस्पति (ख) वरुण (ग) प्लूटो (घ) शनि
उत्तर- (ग) प्लूटो
प्रश्न- 5. ध्रुव तारा और लुब्धक में से कौन अधिक चमकदार तारा हैं?
उत्तर- ध्रुव तारा और लुब्धक में से लुब्धक अधिक चमकदार है। लुब्धक को रात के आकाश का सबसे चमकीला तारा माना जाता है।
प्रश्न- 6. सौर परिवार का किसी चित्रकार द्वारा बनाया गया चित्र 12.12 में दर्शाया गया है। क्या इसमें ग्रहों का क्रम ठीक है? यदि ठीक नहीं है तो चित्र के नीचे दिए गए बाॅक्स में उनका सही क्रम लिखिए।
उत्तर-
चित्र में सौर परिवार का सही क्रम होना चाहिए- 1. बुध, 2. शुक्र, 3. पृथ्वी, 4. मंगल, 5. बृहस्पति, 6. शनि, 7. अरुण, 8. वरुण।
प्रश्न- 7. रात्रि-आकाश का एक भाग चित्र 12.13 में दर्शाया गया है। बिग डिपर एवं लिटिल डिपर के तारों को सरल रेखाओं द्वारा जोड़िए। ध्रुव तारे को पहचानिए और चित्र में इसका नाम लिखिए।
उत्तर- ध्रुव तारा लिटिल डिपर के अंतिम तारे को कहते हैं। यह तारा हमेशा उत्तर दिशा में रहता है। इन तारों को जोड़ने के लिए हमें बिग डिपर और लिटिल डिपर की आकृति को ध्यान में रखते हुए तारों को एक-दूसरे से जोड़ना होगा। ध्रुव तारे को पहचानने के लिए लिटिल डिपर के हत्थे के अंतिम तारे को देखे और उसे ध्रुव का नाम दें।
बिग डिपर- यह तारामंडल सात तारों से मिलकर बनता है जिसमें से चार तारे एक बड़े चम्मच के कटोरे जैसी आकृति बनाते हैं तथा बाकी के तीन तारे चम्मच के हत्थे जैसे आकृति बनाते हैं।
लिटिल डिपर- यह तारामंडल भी सात तारों से मिलकर बनता है इसकी आकृति भी बिग डिपर जैसी होती है, यह छोटा और कम चमकीला होता है। साथ ही इसका अंतिम तारा ध्रुव तारा हैं।
प्रश्न- 8. रात्रि-आकाश का एक भाग चित्र 12.14 में दर्शाया गया है। इसमें ओरायन तारा-मंडल के तारों को सरल रेखाओं द्वारा जोड़िए। तारे लुब्धक का नाम अंकित कीजिए। इसके लिए आप चित्र 12.3 की सहायता ले सकते हैं।
उत्तर- इस चित्र में हमें ओरियन तारामंडल और लुब्धक तारामंडल दिखाया गया है। तारों को रेखाओं से जोड़ा गया है और लिखा गया है।
- ओरियन तारामंडल
- बेतेलगेस
- बेलाट्रिक्स
- अलनीलम
- मिंटका
- सैफ
- रिगेल
- अलनिटक
- मिरियस
प्रश्न- 9. आप उषाकाल में तारों को लुप्त होते तथा संध्याकाल में प्रकट होते देख सकते हैं। दिन के समय आप तारों को नहीं देख पाते हैं। ऐसा क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर- उषाकाल में तारे लुप्त होते हैं और संध्याकाल में प्रकट होते हैं क्योंकि दिन के समय सूर्य का तेज प्रकाश अधिक प्रबल होता है जिस कारण से तारो का प्रकाश ओझल हो जाता है। सूर्य की इसी तेज रोशनी के कारण तारे नहीं दिखाई देते और जैसे-जैसे रात होती है तारों की रोशनी फिर से दिखाई देती है।
प्रश्न- 10. रात में जब आकाश साफ हो तो बिग डिपर (सप्तर्षि) के अवलोकन का प्रयास 2-3 घंटे के समय अंतराल पर 3-4 बार कीजिए। प्रत्येक बार ध्रुवतारे की स्थिति देखने का प्रयास भी कीजिए। क्या सप्तर्षि गति करते हुए प्रतीत होता है? प्रत्येक प्रेक्षण का समय बताते हुए एक कच्चा रेखाचित्र बनाइए।
उत्तर- बिग डिपर (सप्तर्षि) तारामंडल का अवलोकन करने पर यह प्रतीत होता है कि यह तारामंडल रात के आकाश में धीरे-धीरे अपनी स्थिति बदलता है। यह बदलाव पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है। यदि हम 2-3 घंटे के अंतराल पर इसका अवलोकन करें तो देखें कि सप्तर्षि पश्चिम से पूर्व की ओर धीरे-धीरे गति करता है परंतु ध्रुव तारा अपनी स्थिति में स्थिर रहता है।
पहला प्रेक्षण- 8:00 PM- सप्तर्षि उत्तर दिशा में होता है, ध्रुव तारा लगभग उसी स्थान पर।
दूसरा प्रेक्षण- 10:00 PM- सप्तर्षि थोड़ा आगे बढ़ता हुआ प्रतीत होता है, परंतु ध्रुव तारा वहीं है।
तीसरा प्रेक्षण- 12:00 AM- सप्तर्षि इस समय तक और आगे बढ़ गया है, ध्रुव तारा अभी भी उसी स्थान पर।
प्रश्न- 11. रात्रि-आकाश के बारे में चिंतन कीजिए और इसके संबंध में कोई कविता अथवा कहानी लिखिए।
उत्तर- रात्रि-आकाश के बारे में कविता-
रात के आकाश में तारे झिलमिलाते,
जैसे कोई स्वप्न सुनहरे से आते।
ध्रुव तारा स्थिर खड़ा, मार्ग दिखाता,
सप्तर्षि की चाल, सदा हमें सिखाता।
चांद की रोशनी, तारे संग खेलते,
अंधकार में उजाले के गीत गाते।
रात का यह सन्नाटा, कुछ कह जाता,
हर तारे में कोई नई कहानी बुन जाता।
रात्रि-आकाश के बारे में कहानी-
रात का सन्नाटा चारों ओर फैला था और एक बालक अपने घर की छत से तारो को देख रहा था। उसकी दादी जी ने उसे बताया था कि हर तारा एक कहानी बताता है। एक रात को जब चांद अपनी पूरी रौनक में था, तभी उसने देखा कि सप्तर्षि तारामंडल धीरे-धीरे अपनी जगह बदल रहा है। पर वह देखता है कि ध्रुव तारे की स्थिति अभी भी पहली जैसी है अर्थात् तारा अपनी जगह पर स्थिर था। उस रात उसने यह तय किया कि वह बड़ा होकर तारो का एक महान ज्ञाता (खगोलशास्त्री) बनेगा।











