CLASS-10 SCIENCE


 CHAPTER-7 जीव जनन कैसे करते हैं? 

NOTES 

1. विभिन्न जीवों की अभिकल्प, आकार एवं आकृति समान होने के कारण ही वे सदृश प्रतीत होते हैं।

2. कोशिका के केंद्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों की डी.एन.ए- DNA

(डी. आक्सीराइबोन्यूक्लीक अम्ल) के अणुओं में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता हैं, जो जनक से संतति पीढ़ी में जाता है। कोशिका के केंद्रक के डी.एन.ए में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है।

3. जनन की मूल घटना डी.एन.ए (DNA) की प्रतिकृति बनाना है। डी.एन.ए की प्रतिकृति बनाने के लिए कोशिकाएं विभिन्न रासायनिक क्रियाओं का उपयोग करती है।


4. जनन कोशिका में डी.एन.ए की दो प्रतिकृतियां बनती है तथा उनका एक-दूसरे से अलग होना आवश्यक है।

  • डी.एन.ए की एक प्रतिकृति को मूल कोशिका में रखकर दूसरी प्रतिकृति को उससे बाहर निकाल देने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि दूसरी प्रतिकृति के पास जैव-प्रक्रमों के अनुरक्षण हेतु संगठित कोशिकीय संरचना तो नहीं होगी।
  • डी.एन.ए की प्रतिकृति बनने के साथ-साथ दूसरी कोशिकीय संरचनाओं का सृजन भी होता रहता है।

5. एक कोशिका विभाजित होकर दो कोशिकाएं बनाती है। दोनों कोशिकाएं यद्यपि एकसमान है कोई भी जैव- रासायनिक प्रक्रिया पूर्णरूपेण विश्वसनीय नहीं होती। यह अपेक्षित है कि डी.एन.ए प्रतिकृति की प्रक्रिया में कुछ विभिन्नता आएगी। परिणामतः बनने वाली डी.एन.ए प्रतिकृतियां एकसमान तो होंगी।
  • परंतु मौलिक डी.एन.ए का समरूप नहीं होंगी। हो सकता है कुछ विभिन्नताएं इतनी उग्र हो कि डी.एन.ए की नई प्रतिकृति अपने कोशिकीय संगठन के साथ समायोजित नहीं हो पाए। इस प्रकार की संतति कोशिका मर जातीं हैं।
  • दूसरी ओर डी.एन.ए प्रतिकृति की अनेक विभिन्नताएं इतनी उग्र नहीं होती। अतः संतति कोशिकाएं समान होते हुए भी किसी न किसी रूप में एक दूसरे से भिन्न होती है। 

6. विभिन्नता का महत्व- जनन के दौरान डी.एन.ए प्रतिकृति का अविरोध जीव की शारीरिक संरचना एवं डिजाइन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो उसे विशिष्ट निकेत के योग्य बनाती हैं। अतः किसी प्रजाति (स्पीशीज) की समष्टि के स्थायित्व का संबंध जनन से हैं।
  • यदि शीतोष्ण जल में पाए जाने वाले जीवाणुओं की कोई समष्टि है तथा वैश्विक ऊष्मीकरण के कारण जल का ताप बढ़ जाता है तो अधिकतर जीवाणु व्यष्टि मर जाएंगे, परंतु उष्ण प्रतिरोधी क्षमता वाले कुछ परिवर्तन ही जीवित रहते हैं तथा वृध्दि करते हैं।

7. एकल जीवों में प्रजनन की विधि- 
A) विखंडन- एककोशिक जीवों में कोशिका विभाजन अथवा विखंडन द्वारा नए जीवों की उत्पत्ति होती हैं। कुछ एककोशिक जीवों में शारीरिक संरचना अधिक संगठित होती है।
  • बहुखंडन- एककोशिक जीव एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जातें हैं, जिसे बहुखंडन कहते हैं।
  • दूसरी ओर यीस्ट कोशिका से छोटे मुकुल उभर कर कोशिका से अलग हो जातें हैं तथा स्वतंत्र रूप से वृद्धि करते हैं।
B) खंडन- सरल संरचना वाले बहुकोशिक जीवों में जनन की सरल विधि कार्य करतीं हैं। यह टुकड़े अथवा खंड वृध्दि कर नए जीव (व्यष्टि) में विकसित हो जाते हैं। 
  • यह सभी बहुकोशिक जीवों के लिए सत्य नहीं हैं। वे सरल रूप से कोशिका-दर-कोशिका विभाजित नहीं होते।
  • विशेष कार्य हेतु विशिष्ट कोशिकाएं संगठित होकर ऊतक का निर्माण करती है। तथा ऊतक संगठित होकर अंग बनाते हैं, शरीर में इनकी स्थिति भी निश्चित होती है।
  • बहुकोशिक जीवों द्वारा प्रयुक्त एक सामान्य युक्ति यह है कि विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं विशिष्ट कार्य के लिए दक्ष होती है। इस प्रकार के जीवों में जनन के लिए विशिष्ट प्रकार की कोशिकाएं होती है।
  • जीव में कुछ ऐसी कोशिकाएं होनी चाहिए, जिनमें वृध्दि, क्रम, प्रसरण तथा उजित परिस्थिति में विशेष प्रकार की कोशिका बनाने की क्षमता हो।
C) पुनरुभ्दवन (पुनर्जनन)- पूर्णरूपेण विभेदित जीवों में अपने कायिक भाग से नए जीव के निर्माण की क्षमता होती है। अर्थात् यदि किसी कारणवश जीव क्षत-विक्षत हो जाता है अथवा कुछ टुकड़ों में टूट जाता है तो इसके अनेक टुकड़े वृध्दि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं। यह पुनरुभ्दवन कहलाता है।
  • पुनरुभ्दवन विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा संपादित होता है। इन कोशिकाओं के क्रम पसरण से अनेक कोशिकाएं बन जाती है।
  • कोशिकाओं के समूह से परिवर्तन के दौरान विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं एवं ऊतक बनते हैं। यह परिवर्तन बहुत व्यवस्थित रूप एवं क्रम से होता है, जिसे परिवर्धन कहते हैं।
D) मुकुलन- हाइड्रा में कोशिकाओं के नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है। यह उभार (मुकुल) वृध्दि करता हुआ नन्हें जीव में बदल जाता है तथा पूर्ण विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतंत्र जीव बन जाता है।

E) कायिक प्रवर्धन- 
  • अधिकतर जंतुओं के विपरित, एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की विधि के रूप में करते हैं। परतन, कलम अथवा रोपण जैसे कायिक प्रवर्धन की तकनीक का उपयोग कृषि में भी किया जाता है।
  • कायिक प्रवर्धन द्वारा उगाए गए पौधों में बीज द्वारा उगाए पौधों की अपेक्षा पुष्प एवं चमेली जैसे उन पौधों को उगाने के लिए उपयोगी है, जो बीज उत्पन्न करने की क्षमता खो चुके हैं।
  • कायिक प्रवर्धन का दूसरा लाभ यह भी है कि इस प्रकार उत्पन्न सभी पौधे आनुवंशिक रूप से जनक पौधे के समान होते हैं।
  • ऊतक संवर्धन- ऊतक संवर्धन तकनीक में पौधे के ऊतक अथवा उसकी कोशिकाओं को पौधे के शीर्ष के वर्धमान भाग से पृथक कर नए पौधे उगाए जाते हैं। इन कोशिकाओं को कृत्रिम पोषक माध्यम में रखा जाता है, जिससे कोशिकाएं विभाजित होकर अनेक कोशिकाओं का छोटा समूह बनाती है, जिसे कैलस कहते हैं।
F) बीजाणु समासंघ- 
  • ब्रेड पर धागे के समान कुछ संरचनाएं विकसित हो जाती है। यह राइजोपस का कवक जाल है। ये जनन के भाग नहीं है, परंतु ऊर्ध्व तंतुओं पर सूक्ष्म गुच्छ संरचनाएं जनन में भाग लेती है।
  • ये गुच्छ बीजाणुधानी है। यह बीजाणु वृद्धि करके राइजोपस के नए जीव उत्पन्न करते हैं।
  • नम सतह के संपर्क में आने पर वह वृद्धि करने लगते हैं।
  • जनन की वह विधि जिसमें नई पीढ़ी का सृजन केवल एकल जीव द्वारा होता है, इसे अलैंगिक जनन कहते हैं।

8. लैंगिक जनन- लैंगिक जनन में दो भिन्न जीवों से प्राप्त डी.एन.ए को समाहित किया जाता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन- जीव की कायिक कोशिकाओं की अपेक्षा गुणसूत्रों की संख्या आधी होती हैं तथा डी.एन.ए की मात्रा भी आधी होती हैं। यह कोशिका विभाजन की प्रक्रिया जिसे अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं, के द्वारा प्राप्त किया जाता है।
  • गतिशील जनन- कोशिका को नर-युग्मक तथा जिस जनन कोशिका में भोजन का भंडार संचित होता है, उसे मादा युग्मक कहते हैं।

9. पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन- 
  • पुष्प के विभिन्न भाग- ब्राह्मदल, दल (पंखुड़ी), पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर। पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर पुष्प के जनन भाग हैं।
  • एकलिंगी- जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्रीकेसर में से कोई एक जननांग उपस्थित होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं। उदाहरण- पपीता, तरबूज 
  • उभयलिंगी- जब पुष्प में पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर दोनों उपस्थित होते हैं, उन्हें उभयलिंगी पुष्प कहते हैं। उदाहरण- गुड़हल, सरसों
  • पुंकेसर नर जननांग है, जो परागकण बनाते हैं। परागकण सामान्यतः पीले हो सकते हैं।
  • स्त्रीकेसर पुष्प के केन्द्र में अवस्थित होता है तथा यह पुष्प का मादा जननांग है।
  • स्त्रीकेसर तीन भागों से बना होता- आधार पर उभरा फूला भाग अंडाशय है, मध्य में लंबा भाग वर्तिका है तथा शीर्ष भाग वर्तिकाग्र है, जो प्रायः चिपचिपा होता है।
  • स्वपरागण- परागकणों को पुंकेसर से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण की आवश्यकता होती है। यदि परागकणों का यह स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है तो यह स्वपरागण कहलाता है।
  • परागकण- एक पुष्प के परागकण दूसरे पुष्प पर स्थानांतरित होते हैं, तो उसे परपरागण कहते हैं।
  • एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक परागकणों का यह स्थानांतरण वायु, जल अथवा प्रापी जैसे वाहक द्वारा संपन्न होता है।
  • परागकणों के उपयुक्त, वर्तिकाग्र पर पहुंचने के पश्चात् नर युग्मक को अंडाशय में स्थित मादा-युग्मक तक पहुंचना होता है। परागकण से एक नलिका विकसित होती है तथा वर्तिका से होती हुई बीजांड तक पहुंचती है।
  • निषेचन के पश्चात्, युग्मनज में अनेक विभाजन होते हैं तथा बीजांड में भ्रूण विकसित होता हैं। बीजांड से एक कठोर आवरण विकसित होता है तथा यह बीज में परिवर्तित हो जाता है। अंडाशय तीव्रता से वृद्धि करता है तथा परिपक्व होकर फल बनाता है।
  • अंकुरण- बीज में भावी पौधा अथवा भ्रूण होता है, जो विभिन्न परिस्थितियों में नवोभ्दिद में विकसित हो जाता है, इस प्रक्रम को अंकुरण कहते हैं।

10. मानव में लैंगिक जनन- 
  • आयु के साथ मानव शरीर में कुछ परिवर्तन आते हैं। कक्षा 1 से 10 तक पहुंचते-पहुंचते लंबाई व भार बढ़ जाना दूध के दांत गिरकर नए दांत निकल आना।
  • किशोरावस्था के प्रारंभिक वर्षों में शारीरिक सौष्ठव बदल जाता। शारीरिक अनुपात बदलता, नए लक्षण आना, संवेदना में भी परिवर्तन।
  • लड़के एवं लड़कियों में कुछ परिवर्तन एक समान होते हैं। जैसे कांख एवं जांघों के मध्य जननांगी क्षेत्र में बाल-गुच्छ निकल आना उनका रंग भी गहरा हो जाना। पैर, हाथ एवं चेहरे पर महीम रोम आ जाना।
  • कुछ परिवर्तन लड़के एवं लड़कियों में भिन्न होते हैं। लड़कियों में स्तन के आकार में वृद्धि तथा स्तनाग्र की त्वचा का रंग भी गहरा होना। लड़कियों में रजोधर्म होना। लड़कों के चेहरे पर दाढ़ी मूंछ निकलना तथा आवाज का फटना। साथ ही दिवास्वप्न अथवा रात्रि में शिश्न भी अक्सर विवर्धन के कारण ऊर्ध्व हो जाता है।
  • कुछ व्यक्तियों में ये परिवर्तन कम आयु में एवं तीव्रता में होते हैं, जबकि अन्य में मंद गति से। 
  • दो व्यक्तियों के बीच जनन कोशिकाओं के वास्तविक स्थानांतरण हेतु विशिष्ट अंग अथवा संरचना की आवश्यकता होती है।
A) नर जनन तंत्र- जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान पर पहुंचाने वाले अंग, संयुक्त रूप से, नर जनन तंत्र बनाते हैं।
  • नर जनन कोशिका अथवा शुक्राणु का निर्माण वृषण में होता है।
  • शुक्राणु उत्पादन के नियंत्रण के अतिरिक्त टेस्टोस्टेरोन लड़को में यौवनावस्था के लक्षणों का भी नियंत्रण करता है।
  • शुक्राणु- शुक्राणु सूक्ष्म संरचनाएं है, जिसमें मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ होते हैं तथा एक लंबी पूंछ होती है, जो उन्हें मादा जनन-कोशिका की ओर तैरने में सहायता करती है।
B) मादा जनन तंत्र- मादा जनन कोशिकाओं अथवा अंड-कोशिका का निर्माण अंडाशय में होता है।
  • लड़की के जन्म के समय ही अंडाशय में हजारों अपरिपक्व अंड होते हैं। यौवनारंभ में इनमें से कुछ परिपक्व होने लगते हैं। दो मे से एक अंडाशय द्वारा प्रत्येक माह एक अंड परिपक्व होता है।
  • दोनों अंडवाहिकाएं संयुक्त होकर एक लचीली थैलेनुमा संरचना का निर्माण करती है, जिसे गर्भाशय कहते हैं। गर्भाशय, ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता है।
  • मैथुन के समय शुक्राणु योनि मार्ग में स्थापित होते हैं, जहां से ऊपर की ओर यात्रा करके वे अंडवाहिका तक पहुंच जाते हैं, जहां अंडकोशिका से मिल सकते हैं। निषेचित अंडा विभाजित होकर कोशिकाओं की गेंद जैसी संरचना या भ्रूण बनाता है।
  • भ्रूण गर्भाशय में स्थापित हो जाता हैं, जहां यह लगातार विभाजित होकर वृद्धि करता है तथा अंगो का विकास करता है।
  • भ्रूण को मां के रूधिर से ही पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होती है जिसे प्लैसेंटा कहते हैं।
  • प्लैसेंटा- यह एक तश्तरीनुमा संरचना हैं, जो गर्भाशय की भित्ति में धंसी होती है। यह मां से भ्रूण को ग्लूकोज, आक्सीजन एवं अन्य पदार्थों के स्थानांतरण हेतु एक बृहद क्षेत्र प्रदान करते हैं।
  • मां के शरीर में गर्भ को विकसित होने में लगभग 9 मास का समय लगता है। गर्भाशय की पेशियों के लयबद्ध संकुचन से शिशु का जन्म होता है।

C) जब निषेचन नहीं होता? 
  • अंडकोशिका का निषेचन नहीं हो तो यह लगभग एक दिन तक जीवित रहती है, क्योंकि अंडाशय प्रत्येक माह एक अंड का मोचन करता है। अतः निषेचित अंड की प्राप्ति हेतु गर्भाशय भी प्रति माह तैयारी करता है। अतः इसकी अंतः भित्ति मांसल एवं स्पोंजी हो जाती है।
  • यह पर्त धीरे-धीरे टूटकर योनि मार्ग से रूधिर एवं म्यूकस के रूप में निष्कासित होती है। इस चक्र में लगभग एक मास का समय लगता है तथा इसे ऋतुस्त्राव अथवा रजोधर्म कहते हैं। इसकी अवधि लगभग 2 से 8 दिनों की होती हैं।
D) जनन स्वास्थ्य- एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को रोगो का संचरण अनेक प्रकार से हो सकता हैं, क्योंकि यौनक्रिया में प्रगाढ़ शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं। अनेक रोगों का लैंगिक संचरण भी हो सकता है।
इसमें जीवाणु जनित, जैसे- गोनेरिया तथा सिफलिस एवं वाइरस संक्रमण जैसे- मस्सा तथा HIV-AIDS शामिल हैं।
  • शिश्न के लिए आवरण अथवा कंडोम के प्रयोग से इनमें से अनेक रोगों के संचरण का कुछ सीमा तक निरोध संभव है।
  • यौन (लैंगिक) क्रिया द्वारा गर्भधारण की संभावना सदी ही बनी रहती हैं। गर्भधारण रोकने के तरीके हैं।
  • एक तरीका यांत्रिक अवरोध का है, जिससे शुक्राणु अंडकोशिका तक न पहुंच सके। शिश्न को ढकने वाले कंडोम अथवा योनि में रखने वाली अनेक युक्तियों का उपयोग किया जा सकता है।
  • दूसरा तरीका शरीर में हार्मोन संतुलन के परिवर्तन का है, जिससे अंड का मोचन ही नहीं होता अतः निषेचन नहीं हो सकता। ये दवाएं सामान्यतः गोली के रूप में ली जाती हैं, परंतु ये हार्मोन संतुलन को परिवर्तित करती है अतः उनके कुछ विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं।
  • गर्भधारण रोकने के लिए कुछ अन्य युक्तियां जैसे कि लूप अथवा काॅपर-टी को गर्भाशय में स्थापित करके भी किया जाता है, गर्भाशय के उत्तेजन से भी कुछ विपरीत प्रभाव हो सकते हैं।
  • पुरूष की शुक्रवाहिकाओं को अवरूद्ध कर दिया जाए तो शुक्राणुओं का स्थानांतरण रूक जाएगा।
  • स्त्री की अंडवाहिनी अथवा फेलोपियन नलिका को अवरूद्ध कर दिया जाए तो अंड (डिंब) गर्भाशय तक नहीं पहुंच सकेगा। दोनों ही अवस्थाओं में निषेचन नहीं हो पाएगा।

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